14 September 2009

लौट आए बीते दिन

किसी दोस्त ने कुछ अच्छा सा भेजा, जिसे पढ़कर वाकई स्कूल के दिन याद आ गए।
यहाँ लिख रहा हूँ, ज़िंदगी की रेलमपेल में शायद आपको भी पुराने दिनों में लौटने का मौका मिल जाए।

Gone are the days!!!


When

The school reopened in June,

And we settled in our new desks and

benches!


When we queued up in book depot,

And got our new books and notes!


When we wanted two Sundays and no Mondays ,
Yet
managed to line up daily for the morning prayers.

We learnt writing with slates and pencils, and

Progressed To fountain pens and ball pens and then Micro tips!


When we began drawing with crayons and evolved to

Colo r pencils and finally sketch pens!


When we started calculating

first with tables and then with

Clarke's tables and advanced to

Calculators and computers!


When we chased one another in the

corridors in Intervals , and returned to the classrooms

Drenched in sweat!


When we had lunch in classrooms, corridors,

Playgrounds,

under the trees and even in cycle sheds!


When all the colors in the world ,

Decorated the campus on the Second Saturdays!


When a single P.T. period in the week's Time Table,

Was awaited more eagerly than the monsoons!


When cricket was played with writing pads as bats ,

And Neckties and socks rolled into balls!


When few played

"kabadi" and "Kho-Kho" in scorching sun,

While others simply played

"book cricket" in the

Confines of classroom!


Of fights but no conspiracies,

Of Competitions but seldom jealousy!


When we used to

watch Live Cricket telecast,

In the opposite house in Intervals and Lunch breaks!


When few rushed at 3:45 to

"Conquer" window seats in our School bus!

While few others had "Big Fun", "peppermint",

"kulfi", " milk ice !" and "sharbat !" at 4o Clock!

Gone are the days

Of Sports Day,

and the annual School Day ,

And the one-month long

preparations for them.


Gone are the days

Of the stressful Quarterly,

Half Yearly and Annual Exams , And the most

enjoyed holidays after them!


Gone are the days

Of tenth and twelfth standards, when

We Spent almost the whole year writing revision tests!

We learnt,

We enjoyed ,

We played,

We won,

We lost,

We laughed,

We cried,

We fought,

We thought.

With so mu ch fun in them, so many friends,

So much experience, all this and more!


Gone are the days

When we used

to talk for hours with our friends!

Now we don't have time to say a 'Hi'!


Gone are the days

When we played games on the road!

Now we

Code on the road with laptop
!


Gone are the days

When we saw stars

Shining at Night!

Now we see stars when our code doesn't

Work
!


Gone are the days

When we sat to chat with Friends on grounds!

Now we chat in chat rooms
.....!


Gone are the days

Where we

studied just to pass!

Now we study to save our job!

Gone are the days

Where we had no money in our pockets and still fun filled on our hearts!!

Now we have the atm as well as credit card but with an empty heart
!!

Gone are the days

Where we shouted on the road!

Now we don't shout even at home


Gone are the days

Where we got lectures from all!

Now we give lectures to all... like the one I'm doing now
....!!

Gone are the days

But not the memories, which will be

Lingering in our hearts for ever and ever and

Ever and ever and ever .....


Gone are the Days.... But still there are lot more Days to come in our Life!!

NO MATTER HOW BUSY YOU ARE ,

DONT FORGET TO

LIVE THE LIFE THAT STILL

E XISTS....

BE HAPPY ALWAYS....TODAY....TOMORROW...F O R E V E R

01 June 2009

चंद गर्म बोसे


यादों की अलमारी
कल रात फिर खोली
खुलते ही बिखर गयी
हंसी की खनक
पायल के कुछ टूटे घुँघरू
उफक तक पहुंचता आँचल
गर्म आगोश की दहक
और सबसे नीचे की दराज़ में
एक लिफाफा था
जिसमें मिले...
चंद गर्म बोसे

26 May 2009

इक बार तो पढ़ा होता

दिमाग जब खामोश होता है, तब दिल की आवाज़ मिलती है।

इसलिए आज उसी आवाज़ के साथ

कुछ हटकर



रात चांदनी की सीढियां उतरकर ख़्वाबों के आँगन में डोलतीं

पलकों की किवाड़ों को धकेलकर तुम भीतर आयीं

और हौले से मेरा हाथ पकड़कर उतर चलीं यादों के तहखाने में

सीलन के बीच किसी कोने में पड़ा था वही लम्हा

जब तुम्हारे लरजते गुलाबी लबों की जुम्बिश में

दिल की हर तह को टटोलकर वजूद को झिंझोड़ने वाली निगाहों में

और पल्लू के कोने को मसलने वाली उँगलियों पर

लिखे उस मजमून को अनदेखा कर दिया था मैंने

आज भी सालती है मुझे उसी लम्हे की फुसफुसाहट

जो हर शाम मुझसे कहती है इक बार सुना तो होता

और हर सुबह दहलीज़ के उस पार

धूप की चादर में सिमटा, अलसाया मिलता है वही लम्हा

जो उतर जाता है मेरे वजूद में और

मेरा वजूद करता है मुझसे वही शिकवा

कि इक बार तो पढ़ा होता

14 May 2009

एग्जिट पोल पर चढ़कर गिरगिट बदलेंगे रंग और तमाशा देखेगी नीचे खड़ी जनता...

लीजिये, मतदान ख़त्म हो गया और अब केवल मतगणना के इंतजार है। बचपन से याद है। मेरा ख़याल है, यह १९८९ का चुनाव था, जब टीवी पर बाकायदा विश्लेषण देखने को मिला। उसके बाद तो कमोबेश हरेक आम चुनाव में अलका सक्सेना और योगेन्द्र यादव के चेहरे मतगणना के दिन दिख जाते थे। तब तो ३ दिन तक उन्हें देखते थे हम, लेकिन ईवीएम के ज़माने में बात दिन भर में ही निपट जाती है।
खैर, हमारा सरोकार तो नए हुक्कामों से है, यानी नयी सरकार से। तो भैया तमाम चैनलों ने अपने अपने कयास ज़ाहिर कर दिए हैं। मंगलवार तक जो राजग का पलड़ा भारी बता रहे थे, उन्हें अब संप्रग बेहतर नज़र आ रहा है। तमाम चैनलों में केवल स्टार न्यूज़ ने राजग की हालत बेहतर बताई है। उसके मुताबिक ४२४ सीटों पर इस गठबंधन को १६५ मिलेंगी और संप्रग के हाथ बस १३९ लगेंगी। लेकिन पूरी सीटों पर सर्वे इसने नहीं किया। बाकी में हेडलाइंस टुडे ने संप्रग को १९१ और राजग को १८० सीट दी हैं। न्यूज़ एक्स संप्रग को १९९ और राजग को १९१ सीट दे रहे है और इंडिया टीवी की नज़र में इन्हें क्रमशः १९५ और १८९ सीट हासिल हो रही हैं। टाईम्स नाउ भी संप्रग को १९८ और राजग को १८३ सीट दे रहा है।
अब भइया गिरगिटों की बांछें खिली हैं। उन्हें बढ़िया सौदों के बदले रंग बदलने का मौका जो मिल रहा है। अबतक कांग्रेस को पानी पीकर गाली देने वाले बेशरम लाल लंगूरों ने गिरगिटिया फितरत दिखा ही दी। माकपा ने कह ही दिया कि भाजपा को इस हालत का फायदा नहीं उठाने देंगे यानी फ़िर संप्रग की सोनिया का दामन थामेंगे। मसखरों के सरताज लालू के तो कहने ही क्या! जयललिता कह ही चुकी हैं की हमेशा की तरह नफ़ा नुकसान देखकर ही फैसला करेंगे यानी कैबिनेट में एकाध मंत्री उनका बन जाए, बढ़िया फंड मिल जाए और क्या चाहिए। सपा तो पिछली बार भी बार बार ज़लील होकर संप्रग के साथ थी। इस बार ताल ठोकी थी, लेकिन सर्वेक्षण के नतीजे आने के बाद वो भी संप्रग के नाम का कीर्तन गाने लगी। राहुल बाबा पर चिंघाड़ने वाली माया मैडम भी अब कांग्रेस का चारा चरने लगें तो अचम्भा नहीं होना चाहिए। यानी सबके रंग बदलेंगे। इनमें से कुछ रंग बदलकर राजग के साथ भी जा सकते हैं और कुछ राजग के पाले से हाथ के साथ भी आ सकते हैं। यानी कई रंग दिखेंगे हमें आपको।
लेकिन इसमें ठगी जायेगी बेचारी जनता। कांग्रेस प्रत्याशी के ख़िलाफ़ बिहार में राजद या लोजपा को वोट देने वाली, यूपी में सपा और बसपा को वोट देने वाली और बंगाल या केरल में लेफ्ट को चुनने वाली जनता अब क्या करेगी। भारतीय राजनीति के इन गिरगिटों की वज़ह से जनता की तो यही नियति है। ऐसे में क्यों नहीं सोचते हम किसी एक दल को बहुमत दिलाने बात? क्यों हमारे लिए देश से बढ़कर विचारधारा हो जाती है? क्यों हमें वो पार्टी अछूत लगती है जो हिन्दुस्तान में हिन्दुओं की बात कहती है और अपने शासन में मुसलमानों पर भी जुल्म नहीं होने देती? मुसलमान तो खैर अनपढ़ और जाहिल मतदाता हैं। उन्हें भाजपा विरोध के अलावा कुछ नहीं सूझता, लेकिन हिन्दू आख़िर क्यों सेकुलरिज्म के इंद्रजाल में फंस जाते हैं?
क्या सेकुलरिज्म यही है कि चुनाव में एक दूसरे पर मुसलमानों के दुश्मन होने की तोहमत लगाएं और बाद में गलबहियां करने लगें? सेकुलरिज्म यही है कि चुनाव में एक दूसरे पर बन्दूक तानें और बाद में सत्ता के लिए एक साथ बैठ जाएँ? क्या इस शब्द का मतलब अपना स्वार्थ साधना ही है ताकि मलाईदार पड़ मिल जाएँ और अगले चुनाव तक नोट बटोरते रहें?
अगर यही है सेकुलरिज्म तो क्या मतलब है इस नौटंकी का? मतदाताओं को अब तो आँखें खोलनी होंगी और सोचना होगा कि उनके वोट का सही इस्तेमाल कैसे होना चाहिए। वरना साल दर साल एग्जिट पोल पर चढेंगे गिरगिट, जनता की पहुँच से होंगे दूर, करेंगे सौदे और हर बार छली जायेगी जनता!

06 May 2009

सचमुच...खतरे में है मुसलमान

चुनाव के दौर में एक जुमला सुनने को मिला कि मुल्क में मुसलमान खतरे में हैं। मज़े की बात है कि किसी नेता ने यह नहीं कहा ( क्यूंकि नेता तो आम हर बात में यही कहते हैं, इसलिए वो कहते, तो ध्यान भी नहीं जाता), बल्कि मीडिया में नाम कमाने के इरादे से आए एक नौजवान ने कहा। दिलचस्प है कि वो नौजवान हिंदू है। मैंने पूछा क्यों, तो उसने वही बातें कहीं, जो सेकुलर प्रजाति के जंतु कहते रहते हैं और जिसे बिहार जैसे प्रांत में गल्थोथरी कहा जाता है।
तो हुआ यह कि हम चाय पीने बैठे थे उसके साथ और उसने कहा कि दंगे जब भी होते हैं, तो मुसलमान मारे जाते हैं, इसलिए वो असुरक्षित हैं। हमने उन्हें कहा कि कई बार दंगों के दोषी तो मुसलमान ही होते हैं, इसके उदाहरण भी हमने मोदी जी के गुजरात से ही दिए, जिन्हें आप भी देख सकते हैं। लेकिन उन्होंने इसे हिंदू मानसिकता करार दिया और कहा कि पिटकर भी हमारा फ़र्ज़ है कि हम मुसलामानों के ख़िलाफ़ कुछ न कहें क्योंकि वो अल्पसंख्यक हैं। तो हमने उनके तर्कों को एक एक कर उठाया और सोचा कि वाकई मुसलमान कितने असुरक्षित हैं। आप भी सुनिए।

१- मुसलमान अल्पसंख्यक हैं। इस वज़ह से उन्हें अधिकार है कि वो बहुसंख्यकों के ख़िलाफ़ कुछ भी कर सकते हैं और बहुसंख्यक कुछ भी नहीं करेंगे। चूंकि इस देश के बहुसंख्यक यानी हिंदू यह बात नहीं मानते इसलिए मुसलमान असुरक्षित हैं। यानी अगर भारत में शुरू से हिंदू रहते हैं, भारत उन्हीं का देश है, उनकी हजारों पीढियों की जन्मभूमि है, तो यह उनका दोष है। उन्हें चाहिए कि इस देश पर हमला करने के बाद जो भी यहाँ बस जाए, उसके पैर धोकर पियें, लेकिन उसके ख़िलाफ़ कुछ न करें। लेकिन सेकुलर नज़रिए में ईसाइयों और सिखों के लिए ऐसा नहीं है क्योंकि उनके पास बड़ा वोट बैंक नहीं है। ईसाई और सिख इतने अनपढ़ और बेवकूफ नहीं हैं कि ज़रा ज़रा सी बात पर लड़ना शुरू कर दें, इसलिए उन्हें भड़काया नहीं जा सकता। अगर वो भड़केंगे नहीं तो दंगे कैसे होंगे और अगर दंगे नहीं होंगे, तो भाजपा जैसी पार्टी को हारने के लिए मुद्दा कहाँ से मिलेगा। इसलिए यह सही है कि हिंदू अगर अपने हित की बात करता है, तो मुसलमान खतरे में आ जाता है।

२- मुसलमान अनपढ़ हैं इसलिए वो हमें मारते हैं। हमारा फ़र्ज़ है कि हम उन्हें पढाएं और बताएं कि वो हमें नहीं मारें, शायद वो मान जायेंगे और अगर नहीं मानते हैं तो उनके मानने तक हमें पिटते ही रहना चाहिए। भाई वाह! यानी अगर वो सरकारी स्कूलों में मुफ्त की पढ़ाई के लिए भी नहीं जाते हैं, तो इसमें हिन्दुओं का क्या दोष? किसे समय समाज के दलित तबके में भी शिक्षा नहीं थी, लेकिन उनके बच्चे तो सरकारी स्कूलों में पढ़कर भी आज शीर्ष पर हैं, फिर मुसलमान क्यों नहीं? धर्म के नाम पर अगर वो पिछडे बनकर रहना चाहते हैं, तो किसी का क्या दोष? उन्हें मदरसे में आधुनिक शिक्षा नहीं देनी क्योंकि ये उनके धर्म का मामला है। उनके यहाँ हमल रोकना गुनाह है इसलिए खाने को रोटी नहीं, लेकिन बच्चे एक दर्ज़न ही होंगे। ऐसे में ज़ाहिर है कि वो या तो साइकिल में पंचर जोडेंगे या चाय की दूकान पर प्याले धोएँगे, ज़्यादा हुआ तो हजामत बनायेंगे। ऐसे में उनके अनपढ़ रहने पर हिन्दुओं का क्या दोष? और हिंदू उसकी सज़ा क्यों भुगते? लेकिन चूंकि हम ऐसा कह रहे हैं, इसलिए मुसलमान खतरे में है।

३- देश में संविधान है, जो कहता है कि संसाधनों पर सभी का समान अधिकार है, लेकिन सेकुलर पी एम ऐसा नहीं मानते। संविधान को नकारते हुए वो कहते हैं कि संसाधनों पर पहला अधिकार मुसलामानों का है। याने मुसलामानों के लिए संविधान जाए भाड़ में! ईसाइयों के लिए ऐसा नहीं, सिखों के लिए ऐसा नहीं, केवल मुसलामानों के लिए ही यह विशेषाधिकार, फ़िर भी खतरे में हैं मुसलमान।

४- हम अपनी धार्मिक पहचान ज़्यादा उभारते हैं, इसलिए मुसलमान भड़क जाता है और हमें मारता है। क्या ज़रूरत है हमें राम का नाम लेने की। नाम नहीं लेंगे, तो क्या राम का अस्तित्व ख़त्म हो जाएगा? वाजिब बात। यानी जहाँ राम पैदा हुए, वहीं उनके नाम पर सेंसर क्यूंकि मुसलमान यह पसंद नहीं करते। जिस देश में हर कोने में राम के मन्दिर हैं वहाँ हिंदू अपने आराध्य का नाम नहीं ले सकता, लेकिन मुल्ला को हक है कि वो दिन में पाँच बार मस्जिद की मीनार पर चढ़कर गला फाड़कर बांग देगा। अगर उसके अल्लाह ओ अकबर को कोई नहीं रोकता तो हिन्दुओं के जय श्री राम पर पाबंदी क्यों? लेकिन भाई ये तो कम्युनल बात कह दी हमने। हम जैसे लोगों की वज़ह से ही तो मुसलमान खतरे में हैं।

५- देश में क़ानून है और उसे सभी मानते हैं क्योंकि संविधान के तहत हमें ऐसा करना ही है। लेकिन मुसलमान कई मामलों में बचे हैं। उनका शरई क़ानून है, पर्सनल लौ है, इसलिए वो क़ानून को नहीं मानेगा। शाहबानो जैसे मामले तो हम सबको याद होंगे। लेकिन हम इसका विरोध करते हैं। इसलिए मुसलमान खतरे में है।

६- भाजपा मज़हब के आधार पर देश को बाँट रही है। इसलिए वो ग़लत है। मुसलामानों को उनके मज़हब की वज़ह से आरक्षण मिल रहा है। पी एम तो इसे बढाकर २५ फीसदी करने तक की वकालत करते हैं। लेकिन यह मज़हब के आधार पर हिंदू मुसलमान को बाँटना थोड़े ही हुआ। अपने मज़हब को देश से बढ़कर मानने वाले इन मुसलमानों के ख़िलाफ़ कुछ कह दें, तो वो असुरक्षित हैं।

७- आख़िरी बात- अमेरिका, भारत, चीन के ख़ास हिस्सों, इंडोनेशिया, मलयेशिया, खाडी, ब्रिटेन, स्पेन, अफ्रीका.....जहाँ भी निगाह दौडाइए, दहशत की वज़ह एक ख़ास मज़हब ही है। तलवार के बल पर धर्म को फैलाना, काफिरों को काटने का धार्मिक संदेश...फ़िर भी खतरे में हैं मुसलमान।

कहने को तो बहुत है, लेकिन हिन्दुओं को नपुंसक बनाने वाले इन तर्कों का युवाओं के मन में घर कर जाना और प्रोग्रेसिव होने के नाम पर राम के नाम को बैन करने की वकालत करना शायद सबसे बड़ा खतरा है। जो अपनी संस्कृति और अपनी जड़ों से ही कट गया, वो कभी पनप नहीं सकता और हिन्दुओं को जड़ से ही ख़त्म करने की सेकुलर साजिश है यह। अभी समय है, जागिये, मुसलमानों को दबाइए नहीं, लेकिन उन्हें सर पर बिठाने की इस होड़ का मुँहतोड़ जवाब दीजिये।

05 May 2009

राहुल बाबा का लाल सलाम...हाय कांग्रेस! तेरी यह दुर्गति....

राहु बाबा..अरे..रे..रे माफ़ कीजियेगा मेरा मतलब है राहुल बाबा यानी युवराज ने भी लाल सलाम कह ही दिया। जी हाँ। उन्हें भी लगता है कि वामपंथ की विचारधारा कांग्रेस से बहुत मिलती जुलती है (हम भी तो यही कहते हैं की दोनों देश को खोखला करने में जुटी हैं) इसलिए चुनाव के बाद इन पार्टियों का साथ लेकर सरकार बनाने की उन्हें पूरी उम्मीद है। तो भावी प्रधानमंत्री ( कांग्रेस की परिवार पूजा की परम्परा में ऐसा होना तय है और इसके संकेत भी मिल रहे हैं) ने कहा है यानी समूची कांग्रेस की यही आवाज़ है। यानी यह भी तय हो गया कि कांग्रेस में अपने दम पर सरकार बनाने की कुव्वत नहीं रही। यह बात युवराज ने भी स्वीकार कर ही ली है।

इसका मतलब है कि कांग्रेस भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए किसी भी हद तक गिर सकती है। भई कुछ दिन पहले तक तो यही पार्टी कॉमरेडों को गरियाती फ़िर रही थी, लेकिन जब लगा कि सरकार बनाना मुश्किल है, तो लगी उन्हीं की चप्पलें चाटने। राहुल बाबा काफी समझदार हो गए हैं, इसलिए नीतीश कुमार पर डोरे डालने से भी नहीं चूक रहे, वही नीतीश कुमार, जो राजग में शामिल हैं और कुछ वक्त पहले तक लालू के साथ मिलकर पूरी कांग्रेस उन्हें बिहार का बंटाधार करने के लिए गरियाती थी। लालू के साथ जिन्होंने बिहार के साथ १५ साल तक बलात्कार किया। गज़ब है कांग्रेस! जब देखा कि लालू तीसरे मोर्चे की बात कर रहे हैं, तो नीतीश को ही पटा लो, बीजेपी भी कमज़ोर होगी और लालू अगर अपनी फितरत के मुताबिक पीठ में छुरा घोंपेंगे तो विकल्प भी रहेगा।

राहुल बाबा ने इसी वज़ह से नायडू और नीतीश को विकासपरक मुख्यमंत्री बता डाला। नरेन्द्र मोदी के नाम पर उनके मुंह में दही जम गया क्योंकि भइया मोदी तो बीजेपी से हैं और अछूत हैं, यह बात अलग है कि राजीव गांधी फाउंडेशन को मोदी का कामकाज सबसे अच्छा लगता है। राहुल भाजपा पर उड़ीसा में ईसाइयों को जलाने का आरोप लगाने से भी नहीं चुके, हालांकि वो यह भूल गए कि अब तक तो कंधमाल मामले में बीजेपी का नाम तक नहीं आया। अभी छोटे हैं बेचारे, इसलिए नादानी में ऐसा कह गए।

लेकिन वाम दलों की सरकार के सवाल पर वो अपनी समझदारी बघारना नहीं भूले। साफ़ बोले कि अगर वाम दल १८० सीटें ले आते हैं, तो उन्हें समर्थन दिया जाएगा। तो यहाँ भी शर्त यानी डोर अपने हाथ में ही रहे क्योंकि मनमोहन तो कुछ ही वक्त के पी एमहैं, बाद में तो कमान राहुल को ही मिलनी हैं।

लेकिन कांग्रेस के लिए कुल मिलाकर ये बेहद शर्म की बात हैं। बीजेपी को तो कहीं और से समर्थन नहीं मिलेगा क्योंकि राजनीति में नंगई और दलाली की सारी हदें पार करने वाले "सेकुलर" लालू, पासवान, मुलायम, माया, लाल ब्रिगेड, पवार, जयललिता और भी न मालूम कितने नाम हैं, जो कभी भाजपा के साथ नहीं आयेंगे। ऐसे में भाजपा या राजग तो अकेला ही है। लेकिन अकेली भाजपा से भी कांग्रेस काँप रही है। सबसे पुरानी पार्टी होने का दम भरने वाली जो कांग्रेस इतने साल से लोगों को यह कहकर भरमा रही है कि आज़ादी उसी ने दिलाई है, आज उसकी यह हालत हो गयी। हाय यह दुर्गति। उससे भी ज़्यादा शर्म की बात यह है कि वाम दल उसे लगातार दुत्कार रहे हैं, लेकिन अपनी टेढ़ी पूंछ हिलाती यह पार्टी उसी के चारों और मंडरा रही है। हाय नेहरू, हाय इंदिरा, हाय राजीव ( चूंकि अब शास्त्री या नरसिंह राव को याद करने के दिन नहीं हैं, कांग्रेस को तो सोनिया एंड फॅमिली ने पट्टे पर अपने नाम लिखा किया है न) अगर तुम होते तो मारे शर्म के दुनिया छोड़ ही देते। मगर राहुल बाबा, सोनिया गांधी और शर्म......दूर दूर तक नाता नहीं है भाई।

01 May 2009

बधाई वरुण! डूब मरो सोनिया-माया

वरुण गाँधी के पैरोल की मियाद सुप्रीम कोर्ट ने २ हफ्ते के लिए बढ़ा दी। उन पर आरोप लगाने वालों के मुंह पर यह अदालती जूता है। कुछ दिन रुकिए, जैसे ही वरुण पर से अदालत रासुका हटाएगी, इन लोगों के सामने चुल्लुओं में पानी पेश करना पड़ेगा। मज़े की बात है की सोनिया की कांग्रेस और माया की यूपी सरकार हाथ मिलाकर वरुण को वापस अन्दर कराने की पूरी कोशिश कर रही थीं। अदालत में सरकार की तरफ़ से कहा गया कि वरुण ने पैरोल के दौरान पीलीभीत प्रशासन को नहीं बताया कि वो कहाँ-कहाँ जायेंगे और इस तरह उन्होंने उस शपथ पत्र का उल्लंघन किया, जो ज़मानत हासिल करने के लिए दिया गया था। लेकिन कोर्ट ने उनके इस तर्क को खारिज कर दिया।
सरकार के वकील साल्वे ने यह भी कहा कि केन्द्र सरकार ने रासुका हटाये जाने की वरुण की अपील ठुकरा दी है। इसलिए भी उन्हें जेल में डाल दिया जाना चाहिए। खैर, केन्द्र सरकार को तो ऐसा करना ही था। माया और सोनिया की साजिश जो है यह। एक बात यह भी है कि सोनिया अपने लाड़ले राहुल बाबा के सामने किसी और युवा गाँधी की चुनौती नहीं चाहती हैं, इसीलिए बेचारे वरुण का करियर खराब करने पर तुली हैं। लेकिन मतलब की बात यह है कि अदालत ने इस तर्क को नहीं माना और वरुण का पैरोल बढा दिया। तो सोनिया और माया को अब खम्भा नोचने के लिए ही छोड़ देना चाहिए।