नमस्कार

28 May 2010

आज खुश तो बहुत होंगे लालू, दिग्गी और अरुंधती!

फिर एक ट्रेन पटरी से उतार दी गयी... फिर मासूमों की जान गयी... अभी ६८ की मौत बतायी जा रही है... रात तक शायद गिनती और बढ़ जायेगी... जिनके परिजन मारे गए... उनके घरों में कोहराम मचा होगा... अफ़सोस कमोबेश पूरे मुल्क को होगा... मुस्करा रहे होंगे माओवादी.. नक्सली ज़रूर मुस्करा रहे होंगे... गिनती बढ़ने की उम्मीद कर रहे होंगे... जे एन यू में ठहाके लगाए जा रहे होंगे... भगवान न करे इस ट्रेन में उनका भी कोई सगा संबंधी हो, वरना उनके "जश्न" में खलल पद जाएगा.

खुश तो आज त्रिमूर्ति भी होगी... अरे वही लालू प्रसाद, दिग्विजय सिंह और अरुंधती रॉय. नक्सलियों के लिए प्यार का दरिया अगर कहीं बहता है तो वो इन्हीं के दिलों में तो.. लालू फिर कहेंगे कि नक्सलियों के बारे में सूचनाएं पहुंचाने वाले ट्रेन में मरे तो क्या गलत हुआ.. कुछ दिन पहले वैसे भी उनकी इस फितरत की तारीफ़ मैं अपने एक लेख में कर चुका हूँ. गाय भैंसों के साथ रहकर इनका दिमाग भी बैल की तरह हो गया है. पिछले महीने भर में ३ बड़े हमले कर कम से कम १७५ लोगों को हलाक़ करने वाले नक्सली इन्हें बेचारे लगते हैं.

लेकिन दिग्गी राजा का क्या किया जाये. इन्हें कांग्रेस का तेज़ तर्रार नेता मन जाता है. राजा हैं तो मन की कहते हैं. इसलिए मनमोहन सरकार से उलट नक्सलियों के लिए आंसू बहाते रहते हैं. दंतेवाड़ा की जिस घटना को पूरे देश ने (सिवा लालू, अरुंधती और जे एन यू के देश द्रोहियों के) धिक्कारा,  तब ये जनाब टीवी चैनलों पर उनका पक्ष लेते नज़र आये. सरकार माओवादियों को आतकवादी कहने से भी गुरेज़ नहीं कर रही थी और राजा साहेब उन्हें "भूले भटके बेचारे" बता रहे थे. कमाल है. पिछले कई सालों से मासूमों का खून बहाने वाले भूले भटके हैं. अक्सर ये रेलगाड़ियों को निशाना बनाते हैं. आये दिन उन्हें बंधक बनाते हैं. विकास करने वाली पटरियों को उड़ाते रहते हैं. सरकार के कहने पर भी बातचीत के लिए राजी नहीं होते. आम आदमी का खून पानी की तरह बहाते रहते हैं. सुरक्षा बलों को कभी भी हलाक़ कर देते हैं. थानों में आग लगा देते हैं.  समान्तर सरकार चलाकर सरकार को चुनौती देते हैं. फिर भी भूले भटके हैं. अरे भैया जो इतने सालों के लिए भूल जाते हैं, उन्हें भटका नहीं कहा जाता... उनकी याददाश्त हमेशा के लिए चली जाती है और ऐसे में अगर वो खून करने लगें तो उन्हें गोली मारने में भी कोई गुरेज़ नहीं होना चाहिए. लेकिन लालू और दिग्गी को यही मंज़ूर नहीं. दिग्गी तो ऐसा कहने वाले पी चिदंबरम को "अड़ियल" और "घमंडी" कहने से भी नहीं चूकते.

मंज़ूर तो अरुंधती को भी नहीं होगा कि उनके "गांधीवादियों" पर कोई जुल्म ढाया जाए. भाई उनका सत्याग्रह बीच में सरकार क्यों तोड़े. आज तो बन्दूक वाले गांधीवादियों ने दांडी मार्च का एक और पड़ाव पार कर लिया. ये बात अलग है कि मोदी के गुजरात में मौजूद दांडी तक पहुँचने की ज़ुर्रत ये माओवादी शायद ही कर पायें. लेकिन दंतेवाड़ा, झारग्राम को भी अरुंधती दांडी मान सकती हैं, जिसमें भी सहूलियत हो. अच्छा भरोसा तो इस बात का भी नहीं है कि अरुंधती मिठाई बाँट रही हों. हो सकता है कि सुबह उन्होंने  हमला करने वाले पीसीपीए को फ़ोन पर बधाई भी दी हो, उनके असहयोग आन्दोलन के लिए. सुबह किसी चैनल पर सुना था तरुण विजय को ये कहते कि नक्सलियों के हिमायतियों को अब गुलाब लेकर उनके पास जाना चाहिए. हो सकता है अरुंधती ने भेज भी दिए हों.

दरअसल शर्म तो इन्हें आती नहीं और चुल्लू भर पानी इनके डूबने के लिए बिलकुल नाकाफी होगा. तिकड़म करके बुकर पाने वाली अरुंधती आज भी रैकेट के ज़रिये कुछ अखबारों में छपती रहती हैं और कुछ कथित बौद्धिक विमर्शों में हिस्सा लेती रहती हैं. असल में बिसलरी का पानी पीने वाली और महंगी ब्रांडेड खादी पहनने वाली कुपोषण की शिकार अरुंधती को ऐसा करने से बौद्धिक का दर्ज़ा मिल जाता होगा. हिंदुस्तान टाइम्स में वीर सांघवी ने अपने एक लेख में ऐसे लोगों की जमकर खबर ली थी. आप भी देख सकते हैं. सांघवी आम तौर पर मुझे पसंद नहीं आते, लेकिन इस लेख में उन्होंने दिल खुश कर दिया मेरा.. पढेंगे तो उम्मीद है आपका भी हो जाएगा.

लेकिन वामपंथी सहमत नहीं होंगे. क्योंकि देश में उन्हें नक्सलियों का दुःख तो दिखता है, जो गोलियां चला रहे हैं और जान ले रहे हैं. लेकिन जो गोलियां खा रहे हैं, बम हमलों में अपने घरवालों को गँवा रहे हैं, जिनके घर में कमाने वाला इकलौता मारा जा रहा है, जो बच्चे पैदा होने से पहले ही बाप खो दे रहे हैं, उनका दर्द इन्हें नहीं दिखता. देश को तोड़ने पर आमादा नक्सली इन्हें पसंद हैं. लेकिन देश को बचाने के लिए जान देने वाले जवानों की मौत इन्हें दीवाली का सबब दिखती है. वाह री अरुंधती... वाह रे लालू... वाह रे दिग्गी... आज खुश तो बहुत होगे तुम!!!!!

24 May 2010

गुरु के जाल से बची भाजपा!

तो आखिरकार भाजपा को अक्ल आ ही गयी. झारखंड में सत्ता के फेर में फ़ज़ीहत कराने के कगार पर आ चुकी पार्टी ऐन मौके पर संभल गयी और गुरु जी का मंतर जपना बंद कर दिया. दरअसल ये जो गुरु जी यानी शिबू सोरेन हैं, ये अपने पड़ोसी सूबे के लालू प्रसाद की ही तरह हैं. मरते मर जाओ लेकिन इन दोनों पर कभी भरोसा नहीं करो. वैसे तो कहा जाता है कि राजनेताओं पर भरोसा नहीं करना चाहिए, लेकिन ये दोनों तो इस सिद्धांत को अक्षरशः सही साबित करने पर आमादा हैं.

संप्रग को बचाने के लिए गुरु ने भाजपा को संसद में धोखा तो दे दिया, लेकिन बाद में चक्कर में फंस गए. गुरु की सरकार पर जब आन पड़ी तो उन्हें भाजपा ही तारणहार लगी. आनन फानन में कह दिया कि भाजपा की सरकार को समर्थन दे देंगे. उनके पार्टी वालों ने तो ब्लैक के अमिताभ बच्चन की तरह गुरु को भी अल्ज़ाइमर होने की बात कह दी और कैफियत दी कि संसद में गलती से वो संप्रग के पक्ष में बटन दबा गए. गज़ब की कहानी है गुरु की. लेकिन जैसे ही भाजपा सत्ता के लालच में उनसे बात करने को तैयार हो गयी, गुरु का धंधा शुरू हो गया. कांग्रेस ने भाजपा को सत्ता से दूर करने के लिए दाना फेंका और सत्ता के लिए अपनी लार से कई पोखर भरने वाले गुरु उसे चुगने के लिए झपट पड़े. पिछले ४ हफ़्तों में गुरु ने जितने बयान बदले हैं उतने तो सरकार ५ साल में नहीं बदल पाती है. आखिर भाजपा को मामला समझ आया और उसने समर्थन वापस लिया.

वैसे भाजपा को पहले ही समझना चाहिए था की गुरु तो कांग्रेस का ही है. जब हर्षद मेहता का मामला सामने आया था, तभी यह भी पता चला था की नरसिंह राव की सरकार बनवाने के लिए गुरु ने मोटी रकम ऐंठी थी. इसलिए इस गुरु के ज़मीर की तो बात ही नहीं करनी चाहिए. इसकी औकात देखिये.

१- कांग्रेस की सरकार बनवाने के लिए करीब २० साल पहले इसने पहली बार दलाली खाई थी. ये पता चल गया, उससे पहले की दलालियाँ अभी पता नहीं चल सकी हैं. रिश्वत मामले में तो इसे जेल में भी ठूंसा गया था.

२- इसके खिलाफ चिरूडीह में हत्याकांड का मामला सामने आया, जिस वक़्त संप्रग की पिछली सरकार में वो कोयला मंत्री था. वारंट निकला और विपक्ष के दबाव में इसे कैबिनेट से निकाल दिया गया.

३- लेकिन कांग्रेस ने अपने चरित्र के मुताबिक़ झारखंड में भाजपा के खिलाफ समीकरणों के तहत इसे २००४ में ही दोबारा मंत्री बना दिया. सत्ता का सुख चखने के लिए ये मंत्री पद छोड़कर झारखंड में सरकार बनाने चल दिया. नाकाम रहा और कांग्रेस ने इसे फिर मंत्री का ओहदा थमा दिया. इस बार इस पर अपने सचिव का क़त्ल कराने का आरोप लगा. भारत के इतिहास में शायद ही कभी कोई केंद्रीय मंत्री पुलिस से बचने के लिए कुत्तों की तरह भागता फिरा हो, ये भागा और कई हफ़्तों तक भागा. इसे आजीवन कारावास की सज़ा हुई और जेल में दाल दिया गया. दिल्ली हाईकोर्ट ने इसे उस मामले में बरी कर दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में मामला अभी चल रहा है.

४- इस पर ह्त्या का एक और मामला चल रहा है. मधु कोड़ा की तरह इसने भी खान के पट्टे और ठेके दिलाने के लिए कितनी रकम डकारी, इसके राज्य में सभी जानते हैं.

ऐसे घोषित अपराधी पर भाजपा को भरोसा क्यों करना चाहिए था. इसे समर्थन देकर तो उसने नीचता का काम किया ही, गनीमत है की वक़्त पर समर्थन वापस लेकर अपनी जग हंसाई बचा ली. ऐसे गुरु को जितनी जल्दी दक्षिणा देकर विदा करो अच्छा है, शुक्र है भाजपा ने सही कदम उठाया.

23 May 2010

छि.....! फ़ौजी हो तुम....

इराक में बेइंतेहा जुल्म ढाए गए...  अफगानिस्तान को नेस्तनाबूद कर दिया गया... ईरान पर आँखें तरेरी जा रही हैं... विएतनाम को तो किसी लायक ही नहीं छोड़ा गया.... किसने किया ये सब... अमेरिका और उसके पिछलग्गू यूरोपीय मुल्कों की फ़ौज ने... और झिड़की मिल रही है हिन्दुस्तानी फ़ौज को.

कुवैत और इराक के तेल ने उन देशों की अवाम को क्या-क्या दिन नहीं दिखाए. इन्टरनेट पर एक बार सर्च मारिये और आपको सैकड़ों तस्वीरें तक मिल जायेंगी. ज़्यादातर लोग तो टीवी पर दिखाई गयी खाड़ी की दो जंग भूले भी नहीं होंगे. अफगानिस्तान को कुछ ही दिनों में कैसे कब्रिस्तान में तब्दील कर दिया गया, ये भी आपको याद होगा. विएतनाम की तो अब खौफज़दा करने वाली कहानियां ही बची हैं. जब दूसरा विश्व युद्ध हुआ तो अमेरिका ने जापान की कई पीढ़ियों को पैदा होने से पहले ही कैसे अपाहिज किया, पूरी दुनिया जानती है, लेकिन कनाडा को उससे कोई परेशानी नहीं. अमेरिका के तो कुत्ते को भी वो वीज़ा देता है क्योंकि अंकल सैम की लाठी का दर है उसे. यूरोप के लोग तो उसके अपने ही हैं, लेकिन दिक्कत है उसे हिन्दुस्तानी फौजियों से.

कनाडा ने हाल ही में बी एस एफ के एक हवलदार को वीज़ा देने से इनकार कर दिया. उसका कहना है कि बी एस एफ मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वाला हिंसक संगठन है. इसलिए उसे नफरत है उसके फौजियों से. तो भैया... अब हिन्दुस्तान में कुछ भी कर लो.... फ़ौजी मत बनना क्योंकि एक बार ये पाप कर लिया तो चाहे आपका कोई सगा भी कनाडा या अमेरिका या बहुत सारे दूसरे मुल्कों में मर रहा हो, उसे देखने नहीं जा पाओगे.

कमाल है साहब...! किस मुल्क की फ़ौज अपने टैंकों में पूजा का सामान भरकर चलती है जो कनाडा को बी एस एफ से दिक्कत हो गयी. फ़ौज का काम है देश के दुश्मनों पर गोली चलाना... बी एस एफ या कोई भी फ़ोर्स वही करती है, इसमें मानवाधिकार कहाँ से आ गया.. लेकिन भारत है तो आ जाएगा. यहाँ के ५ स्टार में रात रंगीन करने वाले मानवाधिकारवादी फ़ौज को कोसते ही रहते हैं. ये वही लोग हैं जो नक्सलियों को 'बन्दूक वाले गांधीवादी' कहते हैं. अब फ़ौज के बारे में वैसा ही कनाडा ने भी कह दिया.

लेकिन सवाल है कि उसे पूरे यूरोप का पाप नहीं दिखा जिसने आधी दुनिया को गुलाम बना दिया था. भारत पर राज किसका होगा इस बात पर अँगरेज़, फ्रांसीसी और पुर्तगाली लड़ते रहे. क्यों भाई! तुम कहाँ के आका हो कि भारत को अपनी मिलकियत मान  लिया. मानवाधिकारों का सरासर हनन किया, लेकिन कनाडा को वो याद नहीं. हिरोशिमा नागासाकी पर बम गिरा दिया, कनाडा को वो याद नहीं. विएतनाम, इराक और अफगानिस्तान को तबाह कर दिया, उसे भी कनाडा भूल गया... कम्युनिस्ट चीन जैसा मानवाधिकार हनन तो कहीं और होता ही नहीं (इस बात की सनद रहनी चाहिए वामपंथी मानवाधिकारवादियों को), लेकिन कनाडा को उस से भी गुरेज़ नहींहै. उसे दिखा भारत और उसने कह दिया... छि.....! फ़ौजी हो तुम....

अमेरिका से कहने की हिओम्मत नहीं हुई होगी, ब्रिटेन से क्या खाकर कहता क्योंकि एक ही हमाम में तो सब जाते हैं.गर्दन पकड़ी भारत की. दरअसल सरकार ही यहाँ की बिना रीढ़ वाली है. राजमाता खुद यूरोप से आयी हैं, ये भी कनाडा जानता है, मन्नू जी उनके आदेश के बगैर कुछ बोलेंगे नहीं, सो चिंता किस बात की. फिर.. नामाकूल अमेरिका ने कुछ साल पहले नरेन्द्र मोदी को बर्बर बताकर वीजा देने से इनकार किया था. तो राजमाता मुस्कराईं थीं और सरकार कुछ नहीं बोली थी. तो जब एक राज्य के सी एम के साथ ऐसा हो सकता है, तो किसी फ़ौजी की क्या हैसियत!
 
लेकिन मसला तो गंभीर है. आपको नहीं लगता कि भारतीय सेना के खिलाफ षड़यंत्र चल रहा है. कनाडा इतनी जुर्रत करता है, कश्मीर में सेना पर भी दमन के आरोप लगा दिये जाते हैं. न्यूज़ीलैंड के गुरुद्वारे में आतंकवादियों की तस्वीरें बतौर शहीद लगाई जाती हैं. पंजाब के आतंकवाद की जड़ भिंडरावाले को शहीद का दर्ज़ा देने की मांग उठायी जाती है. बांग्लादेश मुक्ति संघर्ष में हमारे जवानों की बहादुरी की फाइलें ही जला दी जाती हैं. आखिर क्यों? सेना का मनोबल क्यों तोड़ा जा रहा है?
 
मोमबत्ती परेड करने वाले इन दोगलों की आखिर औकात ही क्या है जो सेना पर तोहमत लगाते हैं. कोई मरता है तो जंतर मंतर पर मोमबत्ती जलाते हैं और मुस्कराते हुए फोटो खिंचाते हैं, एक दूसरे की ड्रेस की तारीफ़ करते हैं, पिछले सफ़र में दुनिया का कौन सा हिस्सा नाप आये और वहाँ से क्या लाये. यही इनकी बातचीत के मुद्दे रहते हैं. लेकिन ऐसे ही कुछ नरकाहों से भरा अंग्रेज़ी मीडिया इन्हें खूब टूल देता है और आधे पन्ने पर ये ही छाप जाते हैं.
 
इन दुष्टों से कोई पूछे कि पंजाब में आतंकवादियों को पनाह कौन देता था? और कश्मीर में ऐसा कौन कर रहा है? अब उस आम आदमी से सेना पूछताछ करेगी तो कैसे? कम से कम डिनर पर बुलाकर तो नहीं. अब ऐसे में अगर किसी पर ज्यादती हो जाती है तो सेना का कितना कसूर है. अगर पंजाब में सेना ने सख्ती नहीं की होती तो क्या हम आतंकवाद से कभी मुक्ति पाते? अगर पूर्वोत्तर में भी सख्ती न हो तो चीन कब का हमारा हाथ उखाड़ कर ले जाए. फिर... फ़ौज की दरिन्दगी क्या होती है ये तो पाकिस्तान या चीन से पूछो. लेकिन उनकी कोई बात ही नहीं करता. नापा जाता है हिन्दुस्तानी फ़ौजी. घर में भी और बाहर भी. सरकार ने तो चुप रहने की कसम खाई है सो वो चुप ही रहती है.
 
लेकिन सवाल वही है कि ऐसे में क्या आप अपने लाडले को "बदनाम" फ़ौज में भेजेंगे? क्या आप भी अपने फौजियों को धिक्कारेंगे? और अगर ऐसा हुआ तो चारों ओर  से दुश्मनों से घिरे इस मुल्क में जवान कहाँ से आयेंगे. क्या भारत सरकार सुन रही है? क्या मानवाधिकारवादी सुन रहे हैं जिनकी फंडिंग ही अमेरिका और यूरोप से होती है? क्या हमारी फ़ौज सुन रही है? मैं तो पूरी तरह फ़ौज के साथ हूँ और आप?

21 May 2010

इस लालू की तो मा........

नक्सलियों ने एक बस उड़ा दी. दर्ज़नों आम आदमी मारे गए, लेकिन अपनी मर्सडीज़ से उतरकर किसी आलीशान बंगले के सजे संवरे ड्राइंग रूम में गद्देदार सोफे पर धंसकर महंगी शराब की चुस्कियों के बीच बेचारे गरीबों की दशा पर रोने वाले वामपंथी कुछ नहीं बोले. दीगर है कि इस बार जे एन यू में दीवाली भी नहीं मनाई गयी जैसी सी आर पी एफ जवानों पर नक्सली हमले के बाद मनाई गयी थी. इनके बारे में कुछ लिखना चाहते थे. लेकिन पता चला कि भदेस भारत में रहने वाले हमारे मित्र भुवन भास्कर पहले ही आक्रोश ज़ाहिर कर चुके हैं. तो उस पर तो कभी और बोलेंगे.
अलबत्ता आज बारी लालू की है. अरे वही अपने फुटबाल टीम घर में ही रखने वाले लालू प्रसाद जी. भाई इस लालू की तो माया  ही निराली है. कब क्या कह दें कुछ नहीं पता. आज सुबह पता चला कि साहब नक्सली हमले में मासूमों की ह्त्या को जायज़ ठहरा रहे थे. जो देश के आला मंत्री रह चुके हैं एक राज्य की मट्टी पलीद कर चुके हैं और कभी पी एम बनने का सपना भी पाल चुके हैं, उन्हें देश के इस नासूर में कोई बुराई नहीं दिखती. साहब कहते हैं कि अगर नक्सलियों की खबर आम आदमी पुलिस को देगा तो नक्सली उसे मारेंगे ही. इसमें गलत क्या है.
एक तरफ छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह सबसे ऊपर बतायी गयी प्रजाति के लोगों को गरिया रहे हैं और दूसरी तरफ लालू साहब नक्सलियों के गले से लटकने के लिए आमादा हैं. ये वही लालू हैं जो कभी विदेश या गृह मंत्री बनने के सपने देख रहे थे. नक्सलवाद कितना खतरनाक है हम सब जानते हैं. कल्पना कीजिये कि लालू अगर अभी गृह मंत्री होते तो नक्सली क्या करते. शायद हमारे सीनों पर ही चढ़ गए होते. लेकिन भारतीय राजनीति के इतिहास में अब तक के सबसे बड़े इस भांड को कोई दिक्कत ही नहीं है. ये तो यहाँ तक तोहमत लगाते हैं कि दुसरे राज्यों का नक्सलवाद बिहार तक भी पहुँच गया है. तो भैया, अगरचे तुम या तुम्हारी राबड़ी बिहार की सत्ता में आ गयीं तो वहाँ नक्सल विहार ही होगा क्योंकि दुसरे प्रान्तों में उन्हें भगाने की कोशिश चल रही है पर वो भाग नहीं रहे. तुम तो उन्हीं की भाषा बोल रहे हो, तो तुम्हारे यहाँ तो वो दावत खाने आयेंगे.
साहब कहते हैं कि नक्सली हथियार उठा रहे हैं क्योंकि उन्हें उनके अधिकार और विकास से वंचित किया जा रहा है. ये बात ऊपर बतायी गयी प्रजाति के प्राणी और दूसरे राजनेता भी कहते हैं. लेकिन भैया! विकास कहाँ से होगा, जब नक्सली सड़कें तोड़ देंगे, पटरियां उड़ा देंगे, बसें जला देंगे, अस्पताल और स्कूल बंद करा देंगे. आखिर विकास इन्हीं सब से तो होता है, लेकिन नक्सली इन्हीं के दुश्मन है और फिर कहते हैं कि विकास की कमी हथियारों से पूरी कर रहे हैं.
अब बात नेताओं की. भैया! लालू से किसने मना किया था विकास करने को, डेढ़ दशक तक इन्होने बिहार की ऐसी तैसी की, तब नक्सलियों की चिंता इन्हें नहीं हुयी. बिहार को चूसकर फेंक दिया. आज बिहार से ज्यादा बिहारी दूसरे राज्यों में दिखते हैं. दिल्ली में भगदड़ होती है और प्लेटफ़ॉर्म पर बिहारी मारे जाते हैं. मुंबई में मनसे के गुंडों से बिहारी पिटते हैं और पंजाब के खेतों में बिहारियों के पसीने की ही खाद पड़ती है. आखिर ऐसा क्यों? लालू को नज़र नहीं आता. जो निकल जाते हैं वो भूल जाते हैं और जो घर पर रहकर अराजकता झेलते हैं, वो बिहार को अपराध का अखाड़ा बना देते हैं. लालू-राबड़ी जब बिहार का बलात्कार कर रहे थे, तब वहाँ गड्ढों में सड़कें तलाशना मुश्किल था. इसके खिलाफ बेचारे सत्येन्द्र दुबे ने आवाज़ उठायी, तो उन्हें चुप करा दिया गया. शुक्र है कि बिहार में भी चौपायों के हाथ नहीं होते, वर्ना जब लालू ने उनका चारा खाया था तो वो भी बन्दूक उठाकर नक्सली बन जाते.
अच्छा है कि लालू के राजकुमार अरबों की अवैध संपत्ति की वजह से ऐश की ज़िंदगी जी रहे हैं और बस से नहीं चलते, वो फ़ौज में भी नहीं हैं, इसलिए लालू को बेमौत मारे जाने का मतलब नहीं पता, शहादत का मोल भी नहीं पता. इसलिए उन्हें नक्सलियों से हमदर्दी है. ऐसे लालू की तो वाकई मा......!

12 May 2010

.....ये तो होना ही था!

वो हो ही गया जिसका अंदेशा था। अंदेशा क्या.... हमें तो भरोसा था। अपने धोनी भाई मॉडलों की फौज लेकर वेस्ट इंडीज़ से लौट रहे हैं। चैनल स्यापा कर रहे हैं, अखबार शोक सन्देश छाप रहे हैं और धोनी अपने स्टार मॉडलों पर निशाना साध रहे हैं... आईपीएल पार्टियों की आड़ में!

जिस दिन वेस्ट इंडीज़ से ये बहादुर हारे थे, हमारे पास एक एसएमएस आया था, जाहिर तौर पर धोनी के "धुरंधरों" को गाली देने के लिए। हमने तभी लिखा था कि ये खिलाड़ियों की नहीं मॉडलों की टीम है और खेल में तो खिलाड़ी जीतते हैं, मॉडल नहीं। दिलचस्प है कि इसी बात की तस्दीक आज के अखबार में छपी एक खबर ने कर दी। दैनिक जागरण में पढ़ा कि धोनी ने किसी इवेंट कंपनी पर करीब ८ करोड़ रुपये का दावा ठोका है। कमाल है भाई, जब इन्हें ८ करोड़ रुपये कमाने का मौक़ा यूं ही मिल जाता है, तो खेलने की क्या ज़रुरत है।

खैर॥ मैं कुछ और कहना चाहता हूँ। टीम हारी तो मुझे ठीक ही लगा... आईपीएल के वक़्त से चढ़ा क्रिकेट का भूत कुछ कम तो हुआ। चेन्नई की टीम के आईपीएल जीतने पर धोनी की तारीफ़ में कसीदे पढने वाले खबरिया चिनल आज उन्हीं को पानी पीकर गरिया रहे थे। कुछ तो उन्हें कप्तानी से हटाने की मांग तक कर रहे थे। बहुत वाजिब मांग है अलबत्ता कुछ देर से की जा रही है। इस पर अगली बार बात करेंगे। फिलहाल एक सवाल.... आप तुषार खांडेकर को जानते हैं? राजदीप सिंह का नाम सूना है आपने? अच्छा झूलन से तो आप वाकिफ होंगे ही?

नहीं!!!!!! अरे... तुषार दलित खेल हॉकी के उम्दा खिलाड़ी हैं, जिनके २ गोल की बदौलत भारत ने इसी हफ्ते वर्ल्ड चैम्पियन ऑस्ट्रेलिया को धोया है। अजलान शाह हॉकी में राजदीप सिंह भी उम्दा खेल दिखा रहे हैं। भारत अभी तक पाकिस्तान, कोरिया और ऑस्ट्रेलिया को धुन चुका है। झूलन महिला क्रिकेट टीम की कप्तान हैं, जो भारत को महिला २०-२० में विश्व कप के सेमी फाइनल तक पहुंचा चुकी हैं। लेकिन आप इन्हें नहीं जानते क्योंकि अखबारों में इनकी बहादुरी को एक छोटा सा कोना हासिल हो पाता है और चैनल तो इन पर और बी कम वक़्त "बर्बाद" करते हैं। तो ऐसे में आपको बताएगा कौन। जीत हॉकी टीम की होती है और अखबार प्रैक्टिस कर रहे एक बच्चे की तस्वीर छापते हैं क्योंकि वो क्रिकेट के "भगवान" सचिन का बेटा है। उसके बारे में खुद भगवान भी नहीं बता सकते कि वो किसी लायक बनेगा या नहीं क्योंकि रोहन गावस्कर की "प्रतिभा" हम देख चुके हैं, जिन्होंने डार्विन के इस सिद्धांत को सही साबित कर दिया कि धाँसू क्रिकेटर का बेटा धाँसू क्रिकेटर हो, ये ज़रूरी नहीं। फिर भी महिला क्रिकेट टीम के फोटो कम छापते हैं, सचिन के बेटे के ज़्यादा। यहाँ तक कि हॉकी मैच के बजाय मॉडलों की क्रिकेट टीम के वौलीबौल खेलते फोटो ज़्यादा छपते हैं। आखिर क्यों भाई? ऐसे कौन से सुर्खाब के पर लगे हैं इन मॉडलों के? ये तो पद्म सम्मान लेने राष्ट्रपति के पास भी नहीं पहुँचते। हाँ अगर कोई कंपनी १ करोड़ के फ्लैट की चाबी दे, तो आधी रात को पहुँच जाते हैं।

ऐसे लोगों से आप उम्मीद ही क्या करते हैं। किसी वक़्त रवि शास्त्री, कपिल देव वगैरह खेलते थे और खाली वक़्त में विमल, बूस्ट, पामोलिव के विज्ञापन करते थे। आज तो टीम ही मॉडलों की है... ज़ाहिर है कि वो विज्ञापन करते हैं, आईपीएल की नौटंकी में हिस्सा लेते हैं, कंपनियों के कहने पर स्टेज पर आते हैं और खाली वक़्त बचता है तो जनता के दबाव की वज़ह से देश के लिए खेल लेते हैं।

आज हार गए हैं तो भी फ़िक्र नहीं है उन्हें क्योंकि जनता तो भूल ही जायेगी। फिर कोई टूर्नामेंट होगा, मीडिया फिर पगला जायेगी, जनता फिर टीवी से चिपक जायेगी और बीच में विज्ञापन से कमाई तो हो ही रही है। फिर चिंता किस बात की। चिंता तो हॉकी के खिलाड़ी करें क्योंकि वेतन के लिए उन्हें आन्दोलन करना पड़ता है, कम्पनियां तो खैर उनके नाम ही नहीं जानती होंगी। चिंता तो बाइचुंग भूटिया करें जिनके करिश्मे की यूरोप में पूछ है, भारत में तो फुटबॉल को ही कोई नहीं पूछता। यहाँ तो साहब बस क्रिकेट है। उसी का जलवा है, वही खेल है और उसमें शिरकत करने वाले मॉडल ही खिलाड़ी हैं। बाकी तो खेलकूद है जिसके लिए माँ बाप बचपन में ही मन कर देते हैं.

14 September 2009

लौट आए बीते दिन

किसी दोस्त ने कुछ अच्छा सा भेजा, जिसे पढ़कर वाकई स्कूल के दिन याद आ गए।
यहाँ लिख रहा हूँ, ज़िंदगी की रेलमपेल में शायद आपको भी पुराने दिनों में लौटने का मौका मिल जाए।

Gone are the days!!!


When

The school reopened in June,

And we settled in our new desks and

benches!


When we queued up in book depot,

And got our new books and notes!


When we wanted two Sundays and no Mondays ,
Yet
managed to line up daily for the morning prayers.

We learnt writing with slates and pencils, and

Progressed To fountain pens and ball pens and then Micro tips!


When we began drawing with crayons and evolved to

Colo r pencils and finally sketch pens!


When we started calculating

first with tables and then with

Clarke's tables and advanced to

Calculators and computers!


When we chased one another in the

corridors in Intervals , and returned to the classrooms

Drenched in sweat!


When we had lunch in classrooms, corridors,

Playgrounds,

under the trees and even in cycle sheds!


When all the colors in the world ,

Decorated the campus on the Second Saturdays!


When a single P.T. period in the week's Time Table,

Was awaited more eagerly than the monsoons!


When cricket was played with writing pads as bats ,

And Neckties and socks rolled into balls!


When few played

"kabadi" and "Kho-Kho" in scorching sun,

While others simply played

"book cricket" in the

Confines of classroom!


Of fights but no conspiracies,

Of Competitions but seldom jealousy!


When we used to

watch Live Cricket telecast,

In the opposite house in Intervals and Lunch breaks!


When few rushed at 3:45 to

"Conquer" window seats in our School bus!

While few others had "Big Fun", "peppermint",

"kulfi", " milk ice !" and "sharbat !" at 4o Clock!

Gone are the days

Of Sports Day,

and the annual School Day ,

And the one-month long

preparations for them.


Gone are the days

Of the stressful Quarterly,

Half Yearly and Annual Exams , And the most

enjoyed holidays after them!


Gone are the days

Of tenth and twelfth standards, when

We Spent almost the whole year writing revision tests!

We learnt,

We enjoyed ,

We played,

We won,

We lost,

We laughed,

We cried,

We fought,

We thought.

With so mu ch fun in them, so many friends,

So much experience, all this and more!


Gone are the days

When we used

to talk for hours with our friends!

Now we don't have time to say a 'Hi'!


Gone are the days

When we played games on the road!

Now we

Code on the road with laptop
!


Gone are the days

When we saw stars

Shining at Night!

Now we see stars when our code doesn't

Work
!


Gone are the days

When we sat to chat with Friends on grounds!

Now we chat in chat rooms
.....!


Gone are the days

Where we

studied just to pass!

Now we study to save our job!

Gone are the days

Where we had no money in our pockets and still fun filled on our hearts!!

Now we have the atm as well as credit card but with an empty heart
!!

Gone are the days

Where we shouted on the road!

Now we don't shout even at home


Gone are the days

Where we got lectures from all!

Now we give lectures to all... like the one I'm doing now
....!!

Gone are the days

But not the memories, which will be

Lingering in our hearts for ever and ever and

Ever and ever and ever .....


Gone are the Days.... But still there are lot more Days to come in our Life!!

NO MATTER HOW BUSY YOU ARE ,

DONT FORGET TO

LIVE THE LIFE THAT STILL

E XISTS....

BE HAPPY ALWAYS....TODAY....TOMORROW...F O R E V E R

01 June 2009

चंद गर्म बोसे


यादों की अलमारी
कल रात फिर खोली
खुलते ही बिखर गयी
हंसी की खनक
पायल के कुछ टूटे घुँघरू
उफक तक पहुंचता आँचल
गर्म आगोश की दहक
और सबसे नीचे की दराज़ में
एक लिफाफा था
जिसमें मिले...
चंद गर्म बोसे