यादों की अलमारी कल रात फिर खोली खुलते ही बिखर गयी हंसी की खनक पायल के कुछ टूटे घुँघरू उफक तक पहुंचता आँचल गर्म आगोश की दहक और सबसे नीचे की दराज़ में एक लिफाफा था जिसमें मिले... चंद गर्म बोसे
धन्यवाद, कविता मेरा क्षेत्र नहीं है, फिर भी जो दिल में आता है वो सामने रख देता हूँ. @हरकीरत जी. आपके सुझाओ का ध्यान रखूंगा और गैर-हिंदी शब्दों के अर्थ लिख दूंगा. मसलन उफ़क़ का मतलब क्षितिज.
अपने बारे में कहने के मौके कम ही आते हैं, इसलिए सूझता नहीं कि क्या कहें. फिर भी.... कुछ अलग करने की तमन्ना थी, सोचा पत्रकारिता में आने से पूरी हो जायेगी... ग़लत सोचा. यहाँ वही लिखना जो पढने वाले को अच्छा लगे या सम्पादक जी की पसंद हो... अपनी मर्जी, समाज, असली तस्वीर... ये कौन से युग की चिड़िया हैं भाई!!! इसलिए भडास यहाँ निकलती है.. कुछ मन की कहता हूँ.. कुछ तल्ख़ भी कहता हूँ... किसी में दम नहीं कि यहाँ रोक सके... तो बस आज़ादी से अपनी कहने और आपकी सुनने यहाँ आया हूँ....
5 टिप्पणियाँ:
यादों की अलमारी
कल रात फिर खोली
खुलते ही बिखर गयी
हंसी की खनक
पायल के कुछ टूटे घुँघरू
बहुत खूब......!!
बहुत ही सुन्दरता से पिरोये शब्द....सराहनीय .....!!
जो हिंदी के शब्द नहीं हैं उनका अर्थ साथ लिख दिया करें .....!!
एक लिफाफा था
जिसमें मिले...
चंद गर्म बोसे
अद्भुत रचना...भावपूर्ण...वाह.
नीरज
धन्यवाद, कविता मेरा क्षेत्र नहीं है, फिर भी जो दिल में आता है वो सामने रख देता हूँ.
@हरकीरत जी. आपके सुझाओ का ध्यान रखूंगा और गैर-हिंदी शब्दों के अर्थ लिख दूंगा. मसलन उफ़क़ का मतलब क्षितिज.
बहुत सही गुरु तुम तो कवि बन गए. लगता है मुझ से प्रेरणा ले रहे हो...हाहाहाहाहाहाहा...मौज ले रहा था. सच मानो कवि ऋषभ को पढ़कर बहुत अच्छा लगा.
bahut hi khub ..........sundar rachana
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