01 June 2009

चंद गर्म बोसे


यादों की अलमारी
कल रात फिर खोली
खुलते ही बिखर गयी
हंसी की खनक
पायल के कुछ टूटे घुँघरू
उफक तक पहुंचता आँचल
गर्म आगोश की दहक
और सबसे नीचे की दराज़ में
एक लिफाफा था
जिसमें मिले...
चंद गर्म बोसे

5 टिप्पणियाँ:

Harkirat Haqeer ने कहा…

यादों की अलमारी
कल रात फिर खोली
खुलते ही बिखर गयी
हंसी की खनक
पायल के कुछ टूटे घुँघरू

बहुत खूब......!!

बहुत ही सुन्दरता से पिरोये शब्द....सराहनीय .....!!
जो हिंदी के शब्द नहीं हैं उनका अर्थ साथ लिख दिया करें .....!!

नीरज गोस्वामी ने कहा…

एक लिफाफा था
जिसमें मिले...
चंद गर्म बोसे

अद्भुत रचना...भावपूर्ण...वाह.
नीरज

ऋषभ कृष्ण ने कहा…

धन्यवाद, कविता मेरा क्षेत्र नहीं है, फिर भी जो दिल में आता है वो सामने रख देता हूँ.
@हरकीरत जी. आपके सुझाओ का ध्यान रखूंगा और गैर-हिंदी शब्दों के अर्थ लिख दूंगा. मसलन उफ़क़ का मतलब क्षितिज.

प्रभाष झा ने कहा…

बहुत सही गुरु तुम तो कवि बन गए. लगता है मुझ से प्रेरणा ले रहे हो...हाहाहाहाहाहाहा...मौज ले रहा था. सच मानो कवि ऋषभ को पढ़कर बहुत अच्छा लगा.

ओम आर्य ने कहा…

bahut hi khub ..........sundar rachana