नमस्कार

21 May 2010

इस लालू की तो मा........

नक्सलियों ने एक बस उड़ा दी. दर्ज़नों आम आदमी मारे गए, लेकिन अपनी मर्सडीज़ से उतरकर किसी आलीशान बंगले के सजे संवरे ड्राइंग रूम में गद्देदार सोफे पर धंसकर महंगी शराब की चुस्कियों के बीच बेचारे गरीबों की दशा पर रोने वाले वामपंथी कुछ नहीं बोले. दीगर है कि इस बार जे एन यू में दीवाली भी नहीं मनाई गयी जैसी सी आर पी एफ जवानों पर नक्सली हमले के बाद मनाई गयी थी. इनके बारे में कुछ लिखना चाहते थे. लेकिन पता चला कि भदेस भारत में रहने वाले हमारे मित्र भुवन भास्कर पहले ही आक्रोश ज़ाहिर कर चुके हैं. तो उस पर तो कभी और बोलेंगे.
अलबत्ता आज बारी लालू की है. अरे वही अपने फुटबाल टीम घर में ही रखने वाले लालू प्रसाद जी. भाई इस लालू की तो माया  ही निराली है. कब क्या कह दें कुछ नहीं पता. आज सुबह पता चला कि साहब नक्सली हमले में मासूमों की ह्त्या को जायज़ ठहरा रहे थे. जो देश के आला मंत्री रह चुके हैं एक राज्य की मट्टी पलीद कर चुके हैं और कभी पी एम बनने का सपना भी पाल चुके हैं, उन्हें देश के इस नासूर में कोई बुराई नहीं दिखती. साहब कहते हैं कि अगर नक्सलियों की खबर आम आदमी पुलिस को देगा तो नक्सली उसे मारेंगे ही. इसमें गलत क्या है.
एक तरफ छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह सबसे ऊपर बतायी गयी प्रजाति के लोगों को गरिया रहे हैं और दूसरी तरफ लालू साहब नक्सलियों के गले से लटकने के लिए आमादा हैं. ये वही लालू हैं जो कभी विदेश या गृह मंत्री बनने के सपने देख रहे थे. नक्सलवाद कितना खतरनाक है हम सब जानते हैं. कल्पना कीजिये कि लालू अगर अभी गृह मंत्री होते तो नक्सली क्या करते. शायद हमारे सीनों पर ही चढ़ गए होते. लेकिन भारतीय राजनीति के इतिहास में अब तक के सबसे बड़े इस भांड को कोई दिक्कत ही नहीं है. ये तो यहाँ तक तोहमत लगाते हैं कि दुसरे राज्यों का नक्सलवाद बिहार तक भी पहुँच गया है. तो भैया, अगरचे तुम या तुम्हारी राबड़ी बिहार की सत्ता में आ गयीं तो वहाँ नक्सल विहार ही होगा क्योंकि दुसरे प्रान्तों में उन्हें भगाने की कोशिश चल रही है पर वो भाग नहीं रहे. तुम तो उन्हीं की भाषा बोल रहे हो, तो तुम्हारे यहाँ तो वो दावत खाने आयेंगे.
साहब कहते हैं कि नक्सली हथियार उठा रहे हैं क्योंकि उन्हें उनके अधिकार और विकास से वंचित किया जा रहा है. ये बात ऊपर बतायी गयी प्रजाति के प्राणी और दूसरे राजनेता भी कहते हैं. लेकिन भैया! विकास कहाँ से होगा, जब नक्सली सड़कें तोड़ देंगे, पटरियां उड़ा देंगे, बसें जला देंगे, अस्पताल और स्कूल बंद करा देंगे. आखिर विकास इन्हीं सब से तो होता है, लेकिन नक्सली इन्हीं के दुश्मन है और फिर कहते हैं कि विकास की कमी हथियारों से पूरी कर रहे हैं.
अब बात नेताओं की. भैया! लालू से किसने मना किया था विकास करने को, डेढ़ दशक तक इन्होने बिहार की ऐसी तैसी की, तब नक्सलियों की चिंता इन्हें नहीं हुयी. बिहार को चूसकर फेंक दिया. आज बिहार से ज्यादा बिहारी दूसरे राज्यों में दिखते हैं. दिल्ली में भगदड़ होती है और प्लेटफ़ॉर्म पर बिहारी मारे जाते हैं. मुंबई में मनसे के गुंडों से बिहारी पिटते हैं और पंजाब के खेतों में बिहारियों के पसीने की ही खाद पड़ती है. आखिर ऐसा क्यों? लालू को नज़र नहीं आता. जो निकल जाते हैं वो भूल जाते हैं और जो घर पर रहकर अराजकता झेलते हैं, वो बिहार को अपराध का अखाड़ा बना देते हैं. लालू-राबड़ी जब बिहार का बलात्कार कर रहे थे, तब वहाँ गड्ढों में सड़कें तलाशना मुश्किल था. इसके खिलाफ बेचारे सत्येन्द्र दुबे ने आवाज़ उठायी, तो उन्हें चुप करा दिया गया. शुक्र है कि बिहार में भी चौपायों के हाथ नहीं होते, वर्ना जब लालू ने उनका चारा खाया था तो वो भी बन्दूक उठाकर नक्सली बन जाते.
अच्छा है कि लालू के राजकुमार अरबों की अवैध संपत्ति की वजह से ऐश की ज़िंदगी जी रहे हैं और बस से नहीं चलते, वो फ़ौज में भी नहीं हैं, इसलिए लालू को बेमौत मारे जाने का मतलब नहीं पता, शहादत का मोल भी नहीं पता. इसलिए उन्हें नक्सलियों से हमदर्दी है. ऐसे लालू की तो वाकई मा......!

10 टिप्पणियाँ:

Suresh Chiplunkar ने कहा…

सॉलिड है बॉस… लगे रहो…

आनन्‍द पाण्‍डेय ने कहा…

बहुत खूब

http://sanskrit-jeevan.blogspot.com/

दिवाकर मणि ने कहा…

ऐसे लालू की तो वाकई मा......^%$%*&(&(*&(*&%^$&
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हथौड़ा गिराए हो बॉस. ई ललुआ हमरी जिलवा का कलंक है भैया।

Sanjay Sharma ने कहा…

Arey aapko pata nahi hai ye Naxalwad ka bahut bada poshak raha hai.

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

सबसे बड़ा चारा-चोर है और इस देश का दुर्भाग्य देखो की उसके बाद भी इस देश की सत्ता में बैठ कर रेल चलाई इसने ५ साल ! इसकी @#$ *&&&%^7

राकेश कौशिक ने कहा…

बात तो सही और सच्ची है

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

बिल्कुल दुरुस्त फरमाया आपने....सहमत्!

सतीश चंद्र सत्यार्थी ने कहा…

खरी बात कही है...
लेकिन ये 'माँ...' वाली भाषा अच्छी नहीं लगी..
मुझे नहीं लगता कि दमदार तरीके से अपनी बात कहने के लिए गलियों का प्रयोग आवश्यक है...
और 'माँ-बहन'किसी की भी हो चाहे बड़े से बड़े पापी की, सम्मान की अधिकारी तो है ही.

भुवन भास्कर ने कहा…

ज़बर्दस्त अभिव्यक्ति। नेताओं की फितरत कम से कम एक बात में कुत्तों से जरूर मिलती है (गडकरी जी वाले कुत्ते नहीं, क्योंकि उनमें से कई तो उनकी अपनी पार्टी में भी हैं)। ये सूखी हड्डी से घायल अपने ही मसूड़े का खून चाटते हुए समझते हैं कि हड्डी का खून बड़ा स्वादिष्ट है। वोट के लिए नक्सलियों, आतंकियों और देशद्रोहियों का समर्थन करते वक्त ये भूल जाते हैं कि एक दिन उसका परिणाम उन्हें ख़ुद भी भुगतना पड़ेगा। इंदिरा गांधी की हत्या उन्हीं के पाले-पोसे भिंडरावाले के मानस पुत्रों ने और राजीव गांधी की हत्या उन्हीं का समर्थन पाने वाले लिट्टे ने की थी। इसका सबक लालू और दिग्विजय जैसे नेता जितनी जल्दी समझ लें, उतना अच्छा।

ऋषभ कृष्ण ने कहा…

@ सतीश सत्यार्थी जी! भाई.... आप गलत समझे. मैंने तो किसी को गालियाँ ही नहीं लिखीं. दर असल आपकी तरह कोई ऐसा न समझ ले, इसलिए मैंने उसी वाक्य को लाल रंग से बड़े फॉण्ट में पूरा भी लिखा है. वाक्य है. इस लालू की तो माया ही निराली है. किसी को गाली देने से बेहतर है तर्क और तथ्य के साथ अपनी बात रखना और मैंने हमेशा ऐसा ही किया है. आशा है अब आप शीर्षक का मतलब समझ गए होंगे और आपकी शिकायत भी दूर हो गयी होगी. आपकी प्रतिक्रया के लिए धन्यवाद.