इराक में बेइंतेहा जुल्म ढाए गए... अफगानिस्तान को नेस्तनाबूद कर दिया गया... ईरान पर आँखें तरेरी जा रही हैं... विएतनाम को तो किसी लायक ही नहीं छोड़ा गया.... किसने किया ये सब... अमेरिका और उसके पिछलग्गू यूरोपीय मुल्कों की फ़ौज ने... और झिड़की मिल रही है हिन्दुस्तानी फ़ौज को.
कुवैत और इराक के तेल ने उन देशों की अवाम को क्या-क्या दिन नहीं दिखाए. इन्टरनेट पर एक बार सर्च मारिये और आपको सैकड़ों तस्वीरें तक मिल जायेंगी. ज़्यादातर लोग तो टीवी पर दिखाई गयी खाड़ी की दो जंग भूले भी नहीं होंगे. अफगानिस्तान को कुछ ही दिनों में कैसे कब्रिस्तान में तब्दील कर दिया गया, ये भी आपको याद होगा. विएतनाम की तो अब खौफज़दा करने वाली कहानियां ही बची हैं. जब दूसरा विश्व युद्ध हुआ तो अमेरिका ने जापान की कई पीढ़ियों को पैदा होने से पहले ही कैसे अपाहिज किया, पूरी दुनिया जानती है, लेकिन कनाडा को उससे कोई परेशानी नहीं. अमेरिका के तो कुत्ते को भी वो वीज़ा देता है क्योंकि अंकल सैम की लाठी का दर है उसे. यूरोप के लोग तो उसके अपने ही हैं, लेकिन दिक्कत है उसे हिन्दुस्तानी फौजियों से.
कनाडा ने हाल ही में बी एस एफ के एक हवलदार को वीज़ा देने से इनकार कर दिया. उसका कहना है कि बी एस एफ मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वाला हिंसक संगठन है. इसलिए उसे नफरत है उसके फौजियों से. तो भैया... अब हिन्दुस्तान में कुछ भी कर लो.... फ़ौजी मत बनना क्योंकि एक बार ये पाप कर लिया तो चाहे आपका कोई सगा भी कनाडा या अमेरिका या बहुत सारे दूसरे मुल्कों में मर रहा हो, उसे देखने नहीं जा पाओगे.
कमाल है साहब...! किस मुल्क की फ़ौज अपने टैंकों में पूजा का सामान भरकर चलती है जो कनाडा को बी एस एफ से दिक्कत हो गयी. फ़ौज का काम है देश के दुश्मनों पर गोली चलाना... बी एस एफ या कोई भी फ़ोर्स वही करती है, इसमें मानवाधिकार कहाँ से आ गया.. लेकिन भारत है तो आ जाएगा. यहाँ के ५ स्टार में रात रंगीन करने वाले मानवाधिकारवादी फ़ौज को कोसते ही रहते हैं. ये वही लोग हैं जो नक्सलियों को 'बन्दूक वाले गांधीवादी' कहते हैं. अब फ़ौज के बारे में वैसा ही कनाडा ने भी कह दिया.
लेकिन सवाल है कि उसे पूरे यूरोप का पाप नहीं दिखा जिसने आधी दुनिया को गुलाम बना दिया था. भारत पर राज किसका होगा इस बात पर अँगरेज़, फ्रांसीसी और पुर्तगाली लड़ते रहे. क्यों भाई! तुम कहाँ के आका हो कि भारत को अपनी मिलकियत मान लिया. मानवाधिकारों का सरासर हनन किया, लेकिन कनाडा को वो याद नहीं. हिरोशिमा नागासाकी पर बम गिरा दिया, कनाडा को वो याद नहीं. विएतनाम, इराक और अफगानिस्तान को तबाह कर दिया, उसे भी कनाडा भूल गया... कम्युनिस्ट चीन जैसा मानवाधिकार हनन तो कहीं और होता ही नहीं (इस बात की सनद रहनी चाहिए वामपंथी मानवाधिकारवादियों को), लेकिन कनाडा को उस से भी गुरेज़ नहींहै. उसे दिखा भारत और उसने कह दिया... छि.....! फ़ौजी हो तुम....
अमेरिका से कहने की हिओम्मत नहीं हुई होगी, ब्रिटेन से क्या खाकर कहता क्योंकि एक ही हमाम में तो सब जाते हैं.गर्दन पकड़ी भारत की. दरअसल सरकार ही यहाँ की बिना रीढ़ वाली है. राजमाता खुद यूरोप से आयी हैं, ये भी कनाडा जानता है, मन्नू जी उनके आदेश के बगैर कुछ बोलेंगे नहीं, सो चिंता किस बात की. फिर.. नामाकूल अमेरिका ने कुछ साल पहले नरेन्द्र मोदी को बर्बर बताकर वीजा देने से इनकार किया था. तो राजमाता मुस्कराईं थीं और सरकार कुछ नहीं बोली थी. तो जब एक राज्य के सी एम के साथ ऐसा हो सकता है, तो किसी फ़ौजी की क्या हैसियत!
लेकिन मसला तो गंभीर है. आपको नहीं लगता कि भारतीय सेना के खिलाफ षड़यंत्र चल रहा है. कनाडा इतनी जुर्रत करता है, कश्मीर में सेना पर भी दमन के आरोप लगा दिये जाते हैं. न्यूज़ीलैंड के गुरुद्वारे में आतंकवादियों की तस्वीरें बतौर शहीद लगाई जाती हैं. पंजाब के आतंकवाद की जड़ भिंडरावाले को शहीद का दर्ज़ा देने की मांग उठायी जाती है. बांग्लादेश मुक्ति संघर्ष में हमारे जवानों की बहादुरी की फाइलें ही जला दी जाती हैं. आखिर क्यों? सेना का मनोबल क्यों तोड़ा जा रहा है?
मोमबत्ती परेड करने वाले इन दोगलों की आखिर औकात ही क्या है जो सेना पर तोहमत लगाते हैं. कोई मरता है तो जंतर मंतर पर मोमबत्ती जलाते हैं और मुस्कराते हुए फोटो खिंचाते हैं, एक दूसरे की ड्रेस की तारीफ़ करते हैं, पिछले सफ़र में दुनिया का कौन सा हिस्सा नाप आये और वहाँ से क्या लाये. यही इनकी बातचीत के मुद्दे रहते हैं. लेकिन ऐसे ही कुछ नरकाहों से भरा अंग्रेज़ी मीडिया इन्हें खूब टूल देता है और आधे पन्ने पर ये ही छाप जाते हैं.
इन दुष्टों से कोई पूछे कि पंजाब में आतंकवादियों को पनाह कौन देता था? और कश्मीर में ऐसा कौन कर रहा है? अब उस आम आदमी से सेना पूछताछ करेगी तो कैसे? कम से कम डिनर पर बुलाकर तो नहीं. अब ऐसे में अगर किसी पर ज्यादती हो जाती है तो सेना का कितना कसूर है. अगर पंजाब में सेना ने सख्ती नहीं की होती तो क्या हम आतंकवाद से कभी मुक्ति पाते? अगर पूर्वोत्तर में भी सख्ती न हो तो चीन कब का हमारा हाथ उखाड़ कर ले जाए. फिर... फ़ौज की दरिन्दगी क्या होती है ये तो पाकिस्तान या चीन से पूछो. लेकिन उनकी कोई बात ही नहीं करता. नापा जाता है हिन्दुस्तानी फ़ौजी. घर में भी और बाहर भी. सरकार ने तो चुप रहने की कसम खाई है सो वो चुप ही रहती है.
लेकिन सवाल वही है कि ऐसे में क्या आप अपने लाडले को "बदनाम" फ़ौज में भेजेंगे? क्या आप भी अपने फौजियों को धिक्कारेंगे? और अगर ऐसा हुआ तो चारों ओर से दुश्मनों से घिरे इस मुल्क में जवान कहाँ से आयेंगे. क्या भारत सरकार सुन रही है? क्या मानवाधिकारवादी सुन रहे हैं जिनकी फंडिंग ही अमेरिका और यूरोप से होती है? क्या हमारी फ़ौज सुन रही है? मैं तो पूरी तरह फ़ौज के साथ हूँ और आप?
यह इंसान महामूर्ख है या मुसलमानों का शातिर दुश्मन !
6 महीने पहले


1 टिप्पणियाँ:
bahut hi sarthak baat kikhi aapne
bharat ke saath hi aisa kyon
http://sanjaykuamr.blogspot.com/
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