नमस्कार

28 May 2010

आज खुश तो बहुत होंगे लालू, दिग्गी और अरुंधती!

फिर एक ट्रेन पटरी से उतार दी गयी... फिर मासूमों की जान गयी... अभी ६८ की मौत बतायी जा रही है... रात तक शायद गिनती और बढ़ जायेगी... जिनके परिजन मारे गए... उनके घरों में कोहराम मचा होगा... अफ़सोस कमोबेश पूरे मुल्क को होगा... मुस्करा रहे होंगे माओवादी.. नक्सली ज़रूर मुस्करा रहे होंगे... गिनती बढ़ने की उम्मीद कर रहे होंगे... जे एन यू में ठहाके लगाए जा रहे होंगे... भगवान न करे इस ट्रेन में उनका भी कोई सगा संबंधी हो, वरना उनके "जश्न" में खलल पद जाएगा.

खुश तो आज त्रिमूर्ति भी होगी... अरे वही लालू प्रसाद, दिग्विजय सिंह और अरुंधती रॉय. नक्सलियों के लिए प्यार का दरिया अगर कहीं बहता है तो वो इन्हीं के दिलों में तो.. लालू फिर कहेंगे कि नक्सलियों के बारे में सूचनाएं पहुंचाने वाले ट्रेन में मरे तो क्या गलत हुआ.. कुछ दिन पहले वैसे भी उनकी इस फितरत की तारीफ़ मैं अपने एक लेख में कर चुका हूँ. गाय भैंसों के साथ रहकर इनका दिमाग भी बैल की तरह हो गया है. पिछले महीने भर में ३ बड़े हमले कर कम से कम १७५ लोगों को हलाक़ करने वाले नक्सली इन्हें बेचारे लगते हैं.

लेकिन दिग्गी राजा का क्या किया जाये. इन्हें कांग्रेस का तेज़ तर्रार नेता मन जाता है. राजा हैं तो मन की कहते हैं. इसलिए मनमोहन सरकार से उलट नक्सलियों के लिए आंसू बहाते रहते हैं. दंतेवाड़ा की जिस घटना को पूरे देश ने (सिवा लालू, अरुंधती और जे एन यू के देश द्रोहियों के) धिक्कारा,  तब ये जनाब टीवी चैनलों पर उनका पक्ष लेते नज़र आये. सरकार माओवादियों को आतकवादी कहने से भी गुरेज़ नहीं कर रही थी और राजा साहेब उन्हें "भूले भटके बेचारे" बता रहे थे. कमाल है. पिछले कई सालों से मासूमों का खून बहाने वाले भूले भटके हैं. अक्सर ये रेलगाड़ियों को निशाना बनाते हैं. आये दिन उन्हें बंधक बनाते हैं. विकास करने वाली पटरियों को उड़ाते रहते हैं. सरकार के कहने पर भी बातचीत के लिए राजी नहीं होते. आम आदमी का खून पानी की तरह बहाते रहते हैं. सुरक्षा बलों को कभी भी हलाक़ कर देते हैं. थानों में आग लगा देते हैं.  समान्तर सरकार चलाकर सरकार को चुनौती देते हैं. फिर भी भूले भटके हैं. अरे भैया जो इतने सालों के लिए भूल जाते हैं, उन्हें भटका नहीं कहा जाता... उनकी याददाश्त हमेशा के लिए चली जाती है और ऐसे में अगर वो खून करने लगें तो उन्हें गोली मारने में भी कोई गुरेज़ नहीं होना चाहिए. लेकिन लालू और दिग्गी को यही मंज़ूर नहीं. दिग्गी तो ऐसा कहने वाले पी चिदंबरम को "अड़ियल" और "घमंडी" कहने से भी नहीं चूकते.

मंज़ूर तो अरुंधती को भी नहीं होगा कि उनके "गांधीवादियों" पर कोई जुल्म ढाया जाए. भाई उनका सत्याग्रह बीच में सरकार क्यों तोड़े. आज तो बन्दूक वाले गांधीवादियों ने दांडी मार्च का एक और पड़ाव पार कर लिया. ये बात अलग है कि मोदी के गुजरात में मौजूद दांडी तक पहुँचने की ज़ुर्रत ये माओवादी शायद ही कर पायें. लेकिन दंतेवाड़ा, झारग्राम को भी अरुंधती दांडी मान सकती हैं, जिसमें भी सहूलियत हो. अच्छा भरोसा तो इस बात का भी नहीं है कि अरुंधती मिठाई बाँट रही हों. हो सकता है कि सुबह उन्होंने  हमला करने वाले पीसीपीए को फ़ोन पर बधाई भी दी हो, उनके असहयोग आन्दोलन के लिए. सुबह किसी चैनल पर सुना था तरुण विजय को ये कहते कि नक्सलियों के हिमायतियों को अब गुलाब लेकर उनके पास जाना चाहिए. हो सकता है अरुंधती ने भेज भी दिए हों.

दरअसल शर्म तो इन्हें आती नहीं और चुल्लू भर पानी इनके डूबने के लिए बिलकुल नाकाफी होगा. तिकड़म करके बुकर पाने वाली अरुंधती आज भी रैकेट के ज़रिये कुछ अखबारों में छपती रहती हैं और कुछ कथित बौद्धिक विमर्शों में हिस्सा लेती रहती हैं. असल में बिसलरी का पानी पीने वाली और महंगी ब्रांडेड खादी पहनने वाली कुपोषण की शिकार अरुंधती को ऐसा करने से बौद्धिक का दर्ज़ा मिल जाता होगा. हिंदुस्तान टाइम्स में वीर सांघवी ने अपने एक लेख में ऐसे लोगों की जमकर खबर ली थी. आप भी देख सकते हैं. सांघवी आम तौर पर मुझे पसंद नहीं आते, लेकिन इस लेख में उन्होंने दिल खुश कर दिया मेरा.. पढेंगे तो उम्मीद है आपका भी हो जाएगा.

लेकिन वामपंथी सहमत नहीं होंगे. क्योंकि देश में उन्हें नक्सलियों का दुःख तो दिखता है, जो गोलियां चला रहे हैं और जान ले रहे हैं. लेकिन जो गोलियां खा रहे हैं, बम हमलों में अपने घरवालों को गँवा रहे हैं, जिनके घर में कमाने वाला इकलौता मारा जा रहा है, जो बच्चे पैदा होने से पहले ही बाप खो दे रहे हैं, उनका दर्द इन्हें नहीं दिखता. देश को तोड़ने पर आमादा नक्सली इन्हें पसंद हैं. लेकिन देश को बचाने के लिए जान देने वाले जवानों की मौत इन्हें दीवाली का सबब दिखती है. वाह री अरुंधती... वाह रे लालू... वाह रे दिग्गी... आज खुश तो बहुत होगे तुम!!!!!

5 टिप्पणियाँ:

berojagr ने कहा…

aap ne hamare aakrosh ko shabd diye...achcha laga.

Manoj ने कहा…

अरे भाई इसमें लालू का क्या रोल है ? पगला गए है क्या.

ऋषभ कृष्ण ने कहा…

@ मनोज. मेरे एक मित्र ने कुछ दिन पहले निठारी काण्ड पर एक लेख लिखा, तो किसी ने उन्हें गरिया दिया. उन्होंने छूटते ही मुझसे कहा कि अच्छा है उसने तुम्हारे किसी ब्लॉग पर गालियाँ नहीं दीं वरना न जाने तुम उसका क्या करते. चलिए आज उनकी बात सही हो गयी. मनोज बाबू! मैंने लालू के बारे में एक छोटा सा लिंक भी दिया है. दूसरे पैरा में नारंगी रंग से "लेख" लिखा है, उसे क्लिक करें और पढ़ लें. शायद आपका "लालू प्रेम" उबल रहा होगा इसीलिये आपने उसे नज़र अंदाज़ कर दिया. दोबारा पढ़ें और टिप्पणी दें. उम्मीद है कि आप लालू जैसी प्रजाति के नहीं हैं और आप पढ़कर ठीक प्रतिक्रिया देंगे. इंतज़ार में.

aarya ने कहा…

सादर वन्दे !
अरे भाई साहब आप किन लोगों कि बात कर रहे हैं, ये तो हमारे देश के नवरत्न हैं, तभी तो बाकी मासूम लोगों कि चिंता ये नहीं करते, इनका मानना है कि जो नवरत्न है उसे ही जीने का अधिकार है, बाकी अगर लोग मर रहे हैं तो ये उनकी नियति है, और ये नक्श्ली थोड़े ही हैं, ये तो इन नवरत्नों के सिपहसलार हैं, इन्ही के कहने पर तो ये चलते हैं, आप इतना तो समझते ही होंगे कि कोई भी अपने सिपहसलार को देशभक्त ही कहेगा. तबतक जबतक कि ये खुद इन्हें मार ना दें, मै भगवान सेमनाता हूँ कि, इन जैसे हर नेताओ के परिवार के लोग इन तथाकथित देशभक्तों के हाथों मरे ....एक मिनट में इनकी बुद्धि ठिकाने आ जाएगी .......|
रत्नेश त्रिपाठी

Onion Insights ने कहा…

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